Thursday, February 6, 2014

गिजुभाई के ख़जाने से आती गुजराती लोक कथाओं की खुशबू

पुस्तक समीक्षा

शिल्प और कथन के हिसाब से देखा जाय तो लोक-कथाएँ सम्पूर्ण जान पड़ती हैं. इन कहानियों को पहली पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को, दूसरी ने तीसरी, तीसरी ने चौथी को सुनाया होगा...जो अब कितनी पीढ़ियों से गुजरती हुई, बिलकुल ही सुडौल रूप में हमारे साथ हैं. लोककथाएं हमेशा से ही लेखक या फिर सुनाने वाले को एक “स्पेस” देती हैं जिसमें वह कहानी को अपने ढंग से, परिवेश के अनुसार या फिर श्रोता के हिसाब से गढ़ता और जोड़ता-घटाता है. लोककथाएँ नदी के किनारे पड़े पत्थरों जैसी होती हैं. बिल्कुल सुडौल, चिकनी. जो कई दशकों या फिर शताब्दी पहले किसी पहाड़ी का हिस्सा रहे होंगे. जो पहाड़ी पर या फिर उससे लुढ़कते हुए न जाने कितने खण्डों में  टूटते हुए, घिसते हुए , हवा के थपेड़ों और नदी की धार से तराशे गए होंगे. कितने सारे अनुभवों और समयअन्तरालों के बीच गुजरते-टकराते-बहते  हुए, वर्त्तमान में नदी के किनारे पर आ लगे हैं. लोककथाओं की यात्रा भी तो अंतहीन होती है...सतत, अनवरत. इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम इन लोक कथाओं को पढ़ें तथा अपनी आने वाली नई पीढ़ी को हस्तांतरित करें. जिससे ये कहानियों युगों-युगों तक जिंदा रहें. इसी बहाने नयी पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी से मिलती रहे. किस्सागो का सफ़र यूँ ही चलता रहे.

शायद इसी दर्शन को समझते हुए ख्यातिलब्ध और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक, चित्रकार और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती ने प्रसिद्ध शिक्षाविद,गांधीवादी और बाल साहित्यकार गिजुभाई बधेका द्वारा लिखित गुजराती लोक कथाओं का पुनर्लेखन और चित्रांकन किया है. जिसे प्रथम बुक्स ने पठन स्तर -३ के बच्चों के लिए “गिजुभाई का खजाना- पहली किताब और दूसरी किताब” शीर्षक से दो खण्डों में प्रकाशित किया है. पठन स्तर-३ का मतलब उन बच्चों से है, पठन कर्म में खुद से पढ़ने के लिए तैयार किये जाते हैं. मुद्रण, संयोजन, भाषा की गुणवत्ता के लिहाज से दोनों खंड उत्कृष्ट हैं. कहानियाँ सुनी-सुनाई ही हैं, जैसी लोक-कथाएँ होती हैं. लेकिन इसके प्रस्तुतिकरण का अंदाज जुदा है. इन कहानियों को सभी उम्र वर्ग के लोग पढ़ना करेंगे. लेकिन इन्हें विशेषरूप से बच्चों को ध्यान में रखते हुए लिखा गया है. जो बेहद रोचक और चुटीली हैं. कहानियों के बीच-बीच में लोकगीतों की कुछ पंक्तियाँ भी लिखी गयी हैं जो बच्चों को आकृष्ट करेंगी.  पूरी किताब रंगीन, अच्छे कागज, शुद्ध हिज्जे और बड़े शब्द आकार (फॉण्ट) में छपी हुई है. मुख्य पृष्ठ और अन्दर के पन्नों पर बड़े-बड़े विषय आधारित कार्टून बने हुए हैं जिन्हें आबिद साहब ने ही बनाया है. किताब के अंदर अंतिम पृष्ठ पर आबिद सुरती और बाहर के अंतिम पृष्ठ पर गिजुभाई बधेका का संक्षिप्त परिचय दिया है, जो पाठकों के लिए निश्चय ही उपयोगी जानकारी है.
गिजुभाई का ख़जाना- पहली किताब” में कुल सात कहानियां हैं जो बीस पन्नों में छपी हैं- डिंग शास्त्र, मनमौजी कौआ, जो बोले सो निहाल, चबर-चबर, करते हों सो कीजिए, फू-फू बाबा और शेर के भांजे. “डिंग-शास्त्र” जय-पराजय की कहानी है जो बुद्धि के प्रयोग की बात करता है, तो “मनमौजी कौआ” आज़ादी का सन्देश देता हुआ, इसकी महत्ता को रेखांकित करता है. “जो बोले सो निहाल” चाचा-भतीजा के मूर्खता को हास्य तरीके से प्रस्तुत करता है तो “चबर-चबर” धूर्त लोगों से बचने की सीख देता है. “करते हों सो कीजिये” अकल बिना नक़ल न करने का सन्देश देता है तो फू-फू बाबा बाप-बेटे के मुसीबत से बचने के अनोखे तरीके को हल्के-फुल्के रूप में प्रस्तुत करता है. “शेर के भांजे” कहानी में एकता में शक्ति को समझाने की कोशिश की गयी है.


गिजुभाई का ख़जाना- दूसरी किताब” में भी कुल सात कहानियां हैं, जो चौबीस पृष्ठों में छपी हैं- लाल बुझक्कड़, सिरफिरा सियार, लड्डू का स्वाद, शायर का भुर्ता, पोंगा पंडित, भोला-भाला, चूहा बन गया शेर. “लाल बुझक्कड़” अनपढ़ गाँव के एक थोड़े होशियार आदमी की कहानी है. वैसे लाल बुझक्कड़ अपने आप में सम्पूर्ण मुहावरा है. “सिरफिरा सियार” किसी के मूर्खता के चरम तक पहुँच कर खुद का नुकसान कर लेने की कहानी है. “लड्डू का स्वाद” दूसरे की नक़ल न करने की सलाह देता है तो “शायर का भुर्ता” चोरी जैसी गलत आदतों से बचने का. “पोंगा पंडित” कहानी में सीधे-सीधे शब्दों में समझाती है कि अपने ज्ञान का समय और परिस्थिति के अनुसार कैसे उपयोग किया जाना चाहिए. “भोला-भाला” कहानी की सीख है कि धूर्त लोगों पर कभी विश्वास न करो. “चूहा बन गया शेर” में चूहे की निर्भीकता को बड़े ही चुटीले अंदाज में कहानी की शक्ल में पिरोया गया है.

कुल मिलकर दोनों खण्डों की चौदह कहानियां बेहद रोचक और पठनीय हैं. बच्चे इस किताब को बहुत पसंद करेंगे. प्रथम बुक्स ने एक खंड का मूल्य चालीस रूपये रखा है. जो पेज और छपाई के हिसाब से सही है पर बच्चों के हिसाब से थोड़ा अधिक है. मेरे अनुसार, मूल्य की वजह से यह एक विशेष वर्ग तक ही अपनी उपस्थिति दर्ज कर पायेगी. अगर सरकारी स्कूल के पुस्तकालय इसे अपने यहाँ रखें तो निश्चित रूप से दोनों खंड बच्चों में लोकप्रिय होंगे और बहुत ही उपयोगी साबित होंगे. आजकल अक्सर कई लोगों से एक शिकायत सुनने को मिलती रहती है कि बाल साहित्य में लेखक, पाठक और अच्छी किताबें नहीं हैं. मेरा आग्रह है कि उन्हें एक बार इन खण्डों को जरूर पढ़ना चाहिए. एक कड़वा सच यह भी है कि सूचना-संचार में आधुनिक मनोरंजन के साधनों की उपलब्धता की वजह से आज की पीढ़ी में बहुतों ने पढ़ना कम कर दिया है या फिर छोड़ दिया है. कुछ की रुचियाँ तक बदल गयी हैं, तो बाल साहित्य पढ़ना दूर की बात है. उम्मीद है कि इसे पढ़ कर आपकी शिकायतें कुछ हद तक जरूर कम हो जायेंगी.    

-नवनीत नीरव-

( विशेष आभार- नीरज श्रीमाल, अज़ीम प्रेमजी पुस्तकालय, सिरोही, राजस्थान का)

Wednesday, July 17, 2013

“मोड़े हुए पन्नों के भीतर” की चर्चा

“मोड़े हुए पन्नों के भीतर” युवा गीतकार/कवि अमन दलाल का दूसरा गीत एवं नवगीत संग्रह है जिसे हिन्द युग्म प्रकाशन,नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है. मोड़े हुए पन्नों से मतलब जीवन के पृष्ठों से है, जिनके महत्व से हम कहीं न कहीं परिचित होते हैं, जिन्हें गुजरते हुए लम्हों के साथ मोड़ते हुए चलते हैं. ताकि जीवन अलग-अलग पड़ाव पर रुक कर हम उन्हें फिर से पलट सकें. जीवन के इस समय में एक नया सबक सीखें और फिर उसे जीवन में उतारने का प्रण लेकर अपनी राह पर गतिमान हो जायें.

एक सतत कार्यवाही/ जो मेरे भीतर चलती है/ निर्भय होकर/ निर्विचार !  

गीत शास्वत हैं। गीत में धरती गाती हैं, पहाड़ गाते हैं, फसलें गाती हैं, उत्सव और मेले ऋतुएं और परम्पराएं गाती हैं। गीत ज्यादा दिनों तक जेहन में जिन्दा रहते हैं. गीतों के साथ एक संस्कार चलता रहता है जो हमारी युगीन परम्पराओं में बार-बार आकर खुद को दुहराता है. जीवन कितना कुछ सीखा जाता है यह अमन के गीत महसूस कराते हैं. ज्ञान जो अब तलक हम किताबों में ढूंढते-फिरते रहे, उसे कभी जिंदगी के गुजरते लम्हों में संजीदगी से देखा होता तो पता चलता ये सीख ही हमारी अपनी है.

हार के स्तम्भ/मुझपर गढ़ते गए/नियति के दोष/ अकारण मढ़ते गए/ मेरा होना कोई आश्चर्य नहीं/ मैं सुख की/ छाया हूँ यहाँ/ नियति का प्राकृत/ जाया हूँ जहाँ/ खुशियाँ मेरा कल हैं

इन्हीं पंक्तियों के माध्यम से अमन अपने जीवन के अनुभवों को हमसे साझा करते हैं. उम्र अभी तेईस की है. लेकिन लेखनी को पढ़ने/समझने से यही लगता है कि जीवन किसी भी क्षण को इन्होंने बेहद हल्के तरीके से कभी नहीं लिया है.

जन्मों की शंकाओं का स्वमेव निवारण हो जाए,
प्रीत-विजित कथाओं का एकमेव उदाहरण हो जाए,
भक्ति की इस स्वस्ति में सौगात अमार हो जाए तो,
इन हाथों में तेरे दोनों हाथ अमर हो जाएँ तो
रे मीत मेरे मनभावन तू ही जीवन है,
तेरी स्मृतियाँ जैसे भागवत का कीर्तन हैं.

‘मोड़े हुए पन्नों के भीतर’ की भाषा एक उम्मीद जगाती है इस युवा कवि से. हाल के वर्षों में हिंदी कविता में आगत शब्दों की भरमार दिखती है खासकर अंगरेजी के विशेष शब्दों की. नए कवि जानबूझकर या फिर चकित करने के इरादे से इन शब्दों का प्रयोग करते हैं. कुछ विशेष पाठक या श्रोता वर्ग के लिए यह बहुत ही नया अनुभव होता है परन्तु कहीं न कहीं इन आगत शब्दों का अत्यधिक प्रयोग कवि के कविता की व्यापकता को प्रभावित करता है. विशेष प्रयत्न से प्रयुक्त इन शब्दों का असर कविता की लोकप्रियता पर पड़ता है. अमन की रचना में ‘विशेष प्रयत्न’ नहीं महसूस होता. शब्द खुद-ब-खुद अपने-अपने स्थान पर आकर मानों बैठ से गए हों और भाव मुखरित हो गए हों. उर्दू के शब्दों का भी अच्छा प्रयोग किया है अमन ने. देश के बड़े शायर मुन्नवर राणा के विचार में –“नए लिखने वालों में जो लोग अपने पूरे संस्कारों के साथ मुझे अच्छे लगते हैं उनमें नौजवान कवि और शायर अमन भी हैं.”

ज़िंदगी को मुक्कमल बनाता हूँ मैं,
ख़ुशबुओं की गज़ल सुनाता हूँ मैं,
इन अंधेरों से डर भी रहा न मुझे,
अपने घर को जो ख़ुद ही जलाता हूँ मैं.

अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाता है. इनके द्वारा ही भाषा में लालित्य का समावेश होता है. अमन के गीतों में भी अलंकारगत शोभा विद्यमान है जो कभी शब्दों में प्रकट होती है तो कभी अर्थ में. अपने गीतों में कुछ अच्छे रूपक चुने हैं गीतकार ने. इन पंक्तियों से बातें स्पष्ट हो जाती हैं.

नित वंचना के गीत गाना/ स्वयं को स्वयं का मीत बनाना/ भांपना मनस की वेदना/ मौन से सीखना संगीत बनाना/ जीवन के इस घोर भंवर में/ ढूढ़ों धन की सम्भवना.

या फिर

प्रीत के गीत में मौन ही संगीत है,
मन के हारे,
हारे मन में, हारकर ही जीत है,
अंतर सतत गाता रहा पर,
व्यंजन के अवसरों पर,
मैं अपने मौन व्रतों को तोड़ नहीं पाया,
दर्द जब अनहद देखा,
मैं अपनी हदों को,
अनहद से जोड़ नहीं पाया.

“मोड़े हुए पन्नों के भीतर” को पढ़कर या फिर इसके गीतों को अमन से सुनकर मन में एक बात का सुकून तो जरूर है कि आज के समय में युवा कवि सम्मलेन मंच से मार्मिक और सारगर्भित गीतों को गाकर सुनाने वाला एक गीतकार/कवि हमारे बीच है. इस गीत संग्रह के लिए अमन को बधाई और अशेष शुभकामनाएं.

तू भी कहीं-न-कहीं तन्हा जरूर है,
हर आवाज़ पर ये क्यूँ ठहरा जा रहा हूँ..
कोई लाख कहे तू नहीं महफ़िल में,
मैं तो तोड़े हर पहरा जा रहा हूँ..


-नवनीत नीरव- 

Wednesday, May 1, 2013

सत्यजित राय की अभिजान (१९६२): फिल्मों में मगही भाषा का प्रवेश

(सत्यजीत राय के जन्मदिन (२ मई) पर विशेष )


प्रसिद्द बांग्ला लेखक एवं साहित्यकार ताराशंकर बंद्योपाध्याय के उपन्यास “अभिजान” पर फ़िल्मकार सत्यजीत राय ने इसी नाम से एक फिल्म बनायी थी. सितम्बर १९६२ में प्रदर्शित हुई इस फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में सौमित्र चटर्जी और वहीदा रहमान थे. सौमित्र चटर्जी ने एक राजपूत टैक्सी ड्राइवर की भूमिका निभाई थी. वहीदा रहमान ने एक भगायी गयी औरत की भूमिका निभाई थी. उनका नाम गुलाबी था जो मगही भाषा बोलती है.
बिहार के मगही साहित्यकार एवं कवि हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने मगही भाषा को पहले पहल सिने पटल पर प्रवेश दिलाने के लिए समस्त मगही भाषी लोगों की तरफ से धन्यवाद देते हुए फ़िल्मकार एवं निर्देशक सत्यजीत राय को एक पत्र लिखा था. सत्यजीत राय ने उस पत्र के जवाब में एक पत्र हरिश्चंद्र प्रियदर्शी को लिखा था. प्रस्तुत है मूल पत्र (जो अंग्रेजी में था) का हिंदी अनुवाद, जिसे आज भी हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने सम्भाल कर रखा हुआ है. 
 सत्यजीत राय
3 लेक टेम्पल रोड, कलकत्ता- 29
26 जनवरी 1963 

प्रिय श्री प्रियदर्शी,
मुझे आपका मेरी फिल्म अभिजान और उसमें मगही भाषा के प्रयोग से सम्बंधित कृपापूर्ण पत्र मिला. ऐसी सराहना सचमुच बड़ी संतोषदायक है और मैं चाहता हूँ कि आप मेरा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें.
शुभकामनाओं सहित
आपका विश्वासी
सत्यजीत राय


ठीक इसके बाद मगही भाषा में फिल्में बनीं. मगही भाषा में बनी पहली फ़िल्म थी “मोरे मन मितवा” जो सन १९६५ ई० में प्रदर्शित की गयी. इसके निर्माता थे आर०डी०बंसल और निर्देशित किया था गिरीश रंजन ने. ज्ञातव्य हो कि ‘मोरे मन मितवा’ फिल्म के पांच गीत हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने ही लिखे थे. जिसमें मो० रफ़ी और आशा भोंसले का गाया गीत “कुसुम रंग लहंगा” और मुबारक बेगम की गयी ग़जल “मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा” काफी लोकप्रिय हुए थे.  

-नवनीत नीरव-

कुछ बातें “मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा” की


“मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा” के रचनाकर हरिश्चंद्र प्रियदर्शी के बारे में कुछ बातें 
(गीतकार हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित)
सन १९६३-६४ की बात है. निर्माता आर० डी० बंसल उस वक्त के युवा निर्देशक गिरीश रंजन के साथ एक मगही फिल्म बना रहे थे “मोरे मन मितवा”. गिरीश रंजन ने इस फिल्म की पटकथा भी लिखी थी. फिल्म मगही में थी. इसलिए उन्होंने अपने स्थानीय जिले नालंदा के गीतकार एवं कवि हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी को गीत लिखने के लिए मुंबई बुलाया. इस फिल्म के संगीतकार थे दत्ताराम. हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने “मोरे मन मितवा” फिल्म के पांच गीत लिखे थे, जिसमें से आशा भोंसले और मो० रफ़ी का गाया गीत “कुसुम रंग लहंगा” और मुबारक बेगम की गायी एक गज़ल “मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा” उस दशक में खासे प्रसिद्द हुए थे. हरिश्चंद्र प्रियदर्शी के लिखे अन्य गीतों को मुकेश, मन्ना डे और सुमन कल्यानपुर ने अपनी-अपनी आवाजें दी थीं. मुबारक बेगम की गायी ग़जल “मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा” का जादू आज तक़रीबन पचास साल बीत जाने पर भी बरकरार है. यह आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास के लोकप्रिय गजलों में यह शुमार है. इस गज़ल के लिखे जाने के पीछे की कहानी के बारे में हरिचन्द्र जी विस्तार से बताते हैं – शुरू में एक सिचुएशन के निमित्त एक गीत लिखा था जिसपर उन्होंने एक गीत लिखा जो इस तरह था तुम बिन सूनी रात रे बालम, तुम बिन सूनी रात. मन की जोत जला जा बालम, तुम बिन सूनी रात......... इस गीत को लता मंगेशकर की आवाज और संगीतकार दत्ताराम के साज के लिए लिखा गया था. लेकिन बाद में निर्देशक गिरीश रंजन की सहमति से ग़जल ‘मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा’ को फिल्म में शामिल किया गया.
इस गज़ल की रचना प्रक्रिया के बारे में पूछने पर हरिश्चंद्र जी मुस्कुराते हुए बताते हैं - शेरो-शायरी का पुराना शौक मुझसे उर्दू में भी जब-तब कुछ लिखवाता रहा है. उनका ज्यादा हिस्सा रिसालों में छप चुका है, अक्सर हरीश “परदेशी” के नाम से. उर्दू की जमीने-अदब पर ‘परदेशी’- इसलिए की अरबी स्क्रिप्ट का नेचुरल सीटिजनशिप ले नहीं पाया- देवनागरी के पासपोर्ट पर हूँ. रंगारंग जिंदगी का एक दौर वह भी था -१९६४-६५ का, जब मैं कलकत्ते-बम्बई में फिल्म का गीतकार हुआ करता था. आर० डी० बंसल की १९६५ में दिखाई गयी फिल्म “मोरे मन मितवा” के एक सिचुएसन के लिए डायरेक्टर, भाई गिरीश रंजन ने जब हिंदी गीत की जगह उर्दू ग़जल रखने की सलाह दी तो मैंने उसे ख़ुशी-ख़ुशी मान लिया. दिसम्बर १९६४ की एक पूरी रात और लेंटिन कोर्ट होटल, बम्बई का बरामदा. सामने समंदर की लहरों पर चांदनी नाच. पैदाइश एक गज़ल की हुई जिसे फिल्म में जगह मिली और बाद में मेरा ग़जल संग्रह भी इसी नाम से आया “मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा”. जो शुरुआत में इस तरह थी; मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा, कई ख़्वाब थे जो मचल गए, मेरे दिल के आईनागाह में लो, चिराग यादों के जल गए. मतला और शुरू के दो शेर फिल्म में गए.दत्ताराम ने सुर की सजावट और मुबारक बेगम की गम में डूबी हुई आवाज के साथ यह ग़जल रिकार्ड और रेडियो से पोपुलर हुई. इस गज़ल को लेकर एक दिलचस्प बहस की बात हरिचन्द्र जी बताते हैं कि गज़ल में प्रयुक्त लफ़्ज ‘आईनागाह’ के बारे में गिरीश रंजन का खयाल था कि यह मुश्किल है आम श्रोताओं की समझ के हिसाब से. हरिश्चंद्र जी का तर्क था की मुल्क में जब बंदरगाह, ईदगाह से लेकर कब्रगाह तक चल रहे हैं तो आईनागाह भी चल जायेगा. गिरीश रंजन ने जब गज़ल गायिका मुबारक बेगम से पूछा तो मुबारक बेगम ने कहा कि- यह लफ़्ज आम तमाशबीनों के लिए मुश्किल होगा. इतना सुनना था कि हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने दूसरी लाइन बदल दी. “मेरे दिल के शीशमहल में फिर लो चिराग यादों के जल गए” इस तरह गज़ल हमारे सामने आई. वर्त्तमान में हरिश्चंद्र जी बिहारशरीफ (नालंदा जिला, बिहार) में निवास कर रहे हैं. इनकी उम्र अस्सी साल से ज्यादा की है. फ़िलहाल ये हिंदी सिनेमा के इतिहास में चुनिन्दा २१ गीतकारों पर एक किताब लिख रहे हैं.
-नवनीत नीरव-
http://www.youtube.com/watch?v=U7kfZUkQrgA ("मेरे आंसुओं पे न मुस्कुरा" गज़ल यहाँ से सुनें)

Friday, April 12, 2013

बत्तीस मन अष्टधातु की प्रतिमा वाले वंशीधर श्रीकृष्ण


झारखण्ड राज्य के उत्तर पश्चिम में स्थित गढ़वा जिला छोटानागपुर का एक अहम हिस्सा रहा है. इस जिले से झारखण्ड राज्य के पलामू और अन्य तीन राज्यों जैसे बिहार के औरंगाबाद, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की सीमाएं लगती हैं. इसलिए इसे गेटवे ऑफ़ छोटानागपुर कहा जाता है. झारखंड की राजधानी रांची से गढ़वा जिला मुख्यालय की दूरी २०५ कि.मी.है. गढ़वा से लगभग ४० कि० मी० पश्चिम में मिर्जापुर सड़क मार्ग पर, उत्तर प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के संगमस्थल और रांची- चोपन रेललाइन पर स्थित है नगर उंटारी.जो एक अनुमंडल भी है. जहाँ पर सम्पूर्ण विश्व में अनुपम, शताब्दियों प्राचीन वंशीधर श्रीकृष्ण की साढ़े चार फ़ीट ऊँची और कथित बत्तीस मन स्वर्णिम अष्टधातु से निर्मित एक मोहक प्रतिमा अवस्थित है. यह अद्भुत प्रतिमा भूमि में गड़े शेषनाग के फन पर निर्मित चौबीस पंखुड़ियों वाले विशाल कमल पर विराजमान है. नगर उंटारी राज परिवार के संरक्षण में यह वंशीधर मंदिर देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है. कई दशकों से यहाँ प्रतिवर्ष फागुन महीने भर आकर्षक एवं विशाल मेला लगता आ रहा है.
मंदिर के प्रस्तर लेख और उसके पुजारी स्व० सिद्देश्वर तिवारी के द्वारा लिखित इतिहास के अनुसार सम्वत १८८५ में नगर उंटारी के महाराज भवानी सिंह की विधवा रानी शिवमानी कुवंर ने लगभग बीस किलोमीटर दूर शिवपहरी पहाड़ी में दबी पड़ी इस कृष्ण प्रतिमा के बारे में स्वप्न देख कर जाना. रानी शिवमानी कुँवर कृष्ण भक्त,धर्मपरायण, और भगवत भक्ति में पूर्ण निष्ठावान थीं. साथ ही वे राज काज का संचालन भी कर रही थीं. बताया जाता है कि एक बार जन्माष्टमी व्रत धारण किये रानी साहिबा को मध्य रात्रि में स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ था. स्वप्न में ही श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा. रानी ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर बनी रहे. तब श्री कृष्ण ने कहा कि कनहर नदी के किनारे शिवपहरी पहाड़ी में उनकी प्रतिमा गड़ी है. तुम आकर मुझे यहाँ से मुझे अपनी राजधानी में ले जाओ. साथ ही उन्हें सपने में वंशीधर श्रीकृष्ण की इस प्रतिमा के दर्शन भी हुए. भगवत कृपा जानकर रानी ने अगले दिन सुबह यह बात राज परिवार के लोगों को बताई. रानी की भक्ति पर लोगों को विश्वास था. राज परिवार ने एक सेना प्रतिमा को खोजने के लिए भेज दी. रानी भी उस सेना के साथ-साथ गयी थीं. विधिवत पूजा अर्चना के बाद रानी की सेना ने शिवपहरी पहाड़ी में रानी के कहे अनुसार खुदाई की तो श्री वंशीधर श्रीकृष्ण की अद्वितीय प्रतिमा मिली. जिसे हाथियों पर बैठाकर नगर उंटारी लाया गया. रानी इस प्रतिमा को अपने गढ़ में स्थापित कराना चाहती थीं. परन्तु नगर उंटारी गढ़ के मुख्य द्वार पर अंतिम हाथी बैठ गया. लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से मशविरा कर वहीँ पर मंदिर का निर्माण कराया. प्रतिमा केवल बंशीधर श्रीकृष्ण की ही थी. इसलिए बनारस से श्री राधा-रानी की अष्टधातु की प्रतिमा बनवाकर मंगाया गया और उसे भी मंदिर में श्रीकृष्ण के साथ स्थापित कराया गया.
इतिहासकार ऐसा अनुमान लगाते हैं कि यह प्रतिमा मराठो के द्वारा बनवाई गई होगी जिन्होंने वैष्णव धर्म का काफी प्रचार किया था और मूर्तियाँ भी बनवाई थीं. मुगलों के आक्रमण से बचाने के लिए मराठों ने इसे शिवपहरी पहाड़ी के कंदराओं में छुपा दिया गया था.
इस मंदिर में १९३० के आस पास एक चोरी भी हुई थी. जिसमें भगवान बंशीधर की बांसुरी और छत्र चोर चुरा के ले गए थे. जिसे उन्होंने पास के ही बांकी नदी में छुपा दिया था. चोरी करने वाले अंधे हो गए थे. उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. परन्तु चोरी की हुई वस्तुएं बरामद नहीं हो पायीं. बाद में राज परिवार ने दुबारा स्वर्ण बांसुरी और छतरी बनवा कर मंदिर में लगवाया.
साठ एवं सत्तर के दशक में बिरला ग्रुप ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था. आज भी श्री वंशीधर की प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अतिसुन्दर एवं अद्वितीय है. बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पोलिश के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है.तो कभी आइये यहाँ, बंशीधर श्रीकृष्ण की मनोहारी छवि के दर्शन करने.   

- नवनीत नीरव -

Friday, April 5, 2013

“मौन मगध में” के बहाने...............(पुस्तक चर्चा)

जीना अतीत या भविष्य में तो नहीं होता. वर्तमान के भाग रहे पल में हम जी लेते हैं. इन भागते, बहते, सरकते पलों को बांध लेने, सहेजते रहने की चाह साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ बनी. इतिहास लेखन, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा वृतांत बनीं. कहने का अभिप्राय है कि इसी बहाने कला के बेजोड़ नमूने गढ़े और प्रस्तुत किये गए. यायावरी या घुम्मकड़ी भी एक कला है. जिसे राजीव रंजन प्रसाद अपनी कृति “मौन मगध में” सार्थक करते दिखते हैं. अपनी पहली ही कृति “आमचो बस्तर” से चर्चित हुए लेखक एवं पर्यावरणविद राजीव रंजन प्रसाद की यह दूसरी कृति है. मगध की ख़ामोशी और चीखते सवालों पर केन्द्रित यह कृति आज तमाम इतिहासकारों, पुरातत्वविद, शोधार्थी एवं हिंदी के तमाम पाठकों के बीच चर्चा का विषय है. ‘मगध’ अपने आप में एक विस्तृत और बड़ा दिलचस्प विषय है जिसकी चर्चा किसी न किसी बहाने हजारों बरसों पुराने इतिहासकाल के संग चली आ रही है.उन्ही ऐतिहासिक गाथाओं एवं घटनाओं को नए सन्दर्भ से जोड़कर प्रस्तुत किया है लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने.

विश्वदीपक राजीव रंजन के बारे में एक पुस्तक समीक्षा में लिखते हैं कि राजीव मगध के नहीं हैं, बस्तरिया हैं, बस्तर से आये हैं. लेकिन इन्हें पढ़कर यही लगता है कि मगध जितना हमारा है, उतना ही या उससे ज्यादा इनका हो चुका है. लेखक ने हाल के वर्षों में खुद को बस्तर विषय में रचे बसे एक विशेषज्ञ की तरह से प्रस्तुत किया है. बस्तर के आदिवासी जन-जीवन, लोक-गाथाएं, लोककलाएं एवं वर्त्तमान के संघर्षों पर इनकी गहरी पकड़ है. आये दिन स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में इनके सारगर्भित लेख पढ़ने को मिलते हैं. शायद इसी वजह से “मौन मगध में” किताब की प्रेरणा बस्तर में गुप्त साम्राज्य की एक पुरानी बुद्ध की प्रतिमा रही है जिसे आज के बस्तर के आदिवासी जनजाति समुदाय ने तंत्रविद्या का देवता “भोंगादेव” अथवा गांडादेव बना दिया है. प्राचीन बस्तर की तलाश में ही लेखक ने पटना से अपनी यात्रा शुरू कर नालंदा, राजगीर, बोधगया और भागलपुर के समीप विक्रमशिला विद्यालय के खंडहरों तक की यात्रा की है.

भारत के कई इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने मगध की प्राचीन राजधानियों और विश्वविद्यालयों के बारे में बहुत कुछ लिखा है. राजीव इसी परम्परा को ईमानदारी से आगे बढ़ाते दिखते हैं. श्रीकांत वर्मा के प्रसिद्ध कविता संग्रह “मगध” के सहारे एक तरह से मगध को आधुनिक समय में फिर से खोजने की कोशिश करते हैं. जिसमें मददगार बनते हैं पटना, नालंदा, गया और भागलपुर के पुरातन स्मारक, अवशेषों के टुकड़े, प्राचीन मंदिर, जनश्रुति और मान्यताएं. जिज्ञासाओं का निवारण तो होता है फिर भी कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं.

“ तुम भी तो मगध को ढूंढ रहे हो

बंधुओं, यह वह मगध नहीं,

जिसे तुमने पढ़ा है, किताबों में,

जिसे तुम मेरी तरह गँवा चुके हो.....”

नालंदा के गौरवशाली परम्परा, ह्वेनसांग की यात्रा, बुद्ध, महावीर, जरासंध, पाल राजवंश, बोधगया का इतिहास, विक्रमशिला विश्वविद्यालय और बख्तियार खिलजी की विध्वंसक सेना के बारे में लेखक ने विस्तार से प्रकाश डाला है. जिसमें कई बातें राजीव रंजन के गहन शोध एवं विमर्श के कारण ही समाहित हो पायी हैं. स्मारकों की दुर्दशा, एक समय के बाद खंडहरों की खुदाई न होना, धार्मिक प्रतिस्पर्धा के कारण होने वाले नुकसान और नयी पीढ़ी के अपने धरोहरों के प्रति उदासीनता को लेखक ने बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती है. नालंदा के ह्वेनसांग मेमोरियल की चर्चा करते हुए लेखक ने प्रथम प्रधानमत्री जवाहर लाल नेहरु और चीन के राष्ट्रपति चाऊ इन लाई के संयुक्त प्रयासों और फिर बाद में चीनी आक्रमण के द्वारा पञ्चशील के सिद्धांतों की होली जलाने का जिक्र भी किया है. ह्वेनसांग का वर्णन करते हुए लेखक लिखता है कि वे एक असंतुष्ट शोधकर्ता थे इसलिए यात्री बन गए. ह्वेनसांग मेमोरियल में उनके यात्रा वृतांतों पर पेंटिंग्स बनी हुई हैं. एक पेंटिंग में ह्वेनसांग को ‘बामियान बुद्ध” की विशाल प्रतिमा के साथ दिखाया गया है. अगर एक दशक पहले की अपनी यादाश्त को हम ताज़ा करें तो पायेंगे कि तालिबान द्वारा मानवता की इस प्राचीन विरासत को मार्च, २००१ में उड़ा दिया गया था और फिर उसी वर्ष सितम्बर में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को उड़ा देना महज एक संयोग नहीं था. अगर अमेरिका ने बामियान बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाये जाने का प्रतिरोध किया होता तो शायद वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को बचाया जा सकता था. जो आख़िरकार उसने इस घटना के बाद आफनिस्तान में किया.

बहुत सारी अच्छी बातों के बीच “मौन मगध में” एक बात अधूरी रह जाती है. वह है मगध की प्राचीन राजधानी ओदंतपुरी की विस्तृत चर्चा. शुरू से ही इतिहासकार मगध की दो राजधानियों राजगृह और पाटलिपुत्र तथा प्राचीन विश्वविद्यालयों नालंदा और विक्रमशिला की चर्चा तो करते हैं, परन्तु मगध की एक और राजधानी ओदंतपुरी (वर्तमान में बिहारशरीफ) और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय की चर्चा छोड़ देते हैं. राजीव रंजन जी भी इस बात को छूते हुए निकल जाते हैं. बिहारशरीफ एक प्राचीन नगर है. इसी नगर ने इस राज्य को बिहार नाम दिया है. ७५० ई० से १५३४ ई० तक यह मगध राज्य की राजधानी था. इसके बारे में फाहियान, ह्वेनसांग, इत्सिंग, धर्मस्वामी, बुस्तान, सुमपा, लामा तारानाथ से लेकर बुकानन, कनिघम, ब्रौडले, बेलगर, फ्रैंकलिन आदि सरीखे प्रख्यात पुराविदों ने लिखा है. किन्तु उनके द्वारा लिखित ओदंतपुरी का मूल इतिहास जमींदोज है. बिहारशरीफ शहर की कचहरी और नालंदा कॉलेज उसी गढ़ पर स्थित बताये जाते हैं. आश्चर्य की बात है कि इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता. स्थानीय इतिहासकार हरिश्चंद्र प्रियदर्शी इसके बारे में अफ़सोस जताते हुए कहते हैं कि “ धरती में धंसी पृथ्वी का उद्धारक वराह कब प्रकट होगा पता नहीं? मौन मगध ने भी इस पर प्रकाश नहीं डाला है. तिब्बत का राजधर्म इसी ओदंतपुरी विश्वविद्यालय ने दिया था. बिहारशरीफ के मुहल्लों के नामों में इसकी धमक आज भी सुनी जा सकती है- किला, गढ़, महल, बारादरी, खंदकपर, धनेश्वरघाट आदि. पर हमारी पीढ़ी इतिहासबोध भूल चुकी है.”

"कहाँ सुन रहे हम धरती की धमनियों में लरज आया अविश्वास का कम्पन

पड़े हैं सूरत नक़्शे कदम, न छेड़ो हमें

हम और खाक में मिल जायेंगे उठाने से. "

ढूह बने गए टीलों के चारों ओर लगे ब्रिटिश राज्य के “निषेध एरिया” की तख्ती को आजाद भारत में उखाड़ फेंका गया. ऐतिहासिक धरोहरों की जमीन खरीदी-बेचीं गयी. इतिहास के मलबे पर ऊँची इमारतें खड़ी कर दी गयीं. स्थानीय लोगों ने ही मूर्तियों की चोरी की. कवि दुष्यंत कुमार कभी बिहारशरीफ नहीं आये थे फिर भी उनका एक शेर यहाँ के हालात और नयी पीढ़ी के रवैये पर सटीक बैठता है -

"मुड़ के देखेगी हिकारत से तुझे तारीख कल,

तेरी पीढ़ी में किसी धड़ पर कोई चेहरा न था."

विडम्बनाएं बहुत सारी हैं. यह ऐतिहासिक नगर न तो राज्य के पुरातात्विक नक़्शे पर है, न ही पर्यटक नक़्शे पर. सुना है कोई पुरातत्व विभाग भी है, कोई पर्यटन विभाग भी है.

सनम, सुना है तुम्हारे भी कमर है!
कहाँ है? किस तरफ है? किधर है ?
शायद यह भी एक वजह है कि इतिहास के पन्नों में जीता-जगता मगध अब मौन है.
-नवनीत नीरव -

Saturday, March 30, 2013

“बदल रहा है हर गाँव हर शहर”

“बदल रहा है हर गाँव हर शहर” टेलीविजन देखते वक्त आप यह पंचलाइन जरूर सुनते होंगे. यह ACC Cement  के विज्ञापन का पंचलाइन है. जिसमें एक बुजुर्ग पूछते हैं “गाँव कैसा है” और उसके जवाब में पूरा ऐड दिखाते हुए यह लाइन दुहरायी जाती है -“बदल रहा है हर गाँव हर शहर”. अब गाँव कितना बदला यह तो विवेचना का विषय है. क्या सीमेंट भी गाँव और शहर का विभेद मिटा सकता है? जवाब हो सकता है “हाँ”. क्योंकि विकास के लिए जरूरी आधारभूत संरचना के लिए सीमेंट अहम् होता है. अगर सीमेंट की फैक्ट्री किसी क्षेत्र में लग जाए तो ? जहाँ तक मेरी सोच जाती है “कायाकल्प हो जाना चाहिए”. कम से कम रोजगार तो मिलेगा ही स्थानीय लोगों को.
दो- तीन सीमेंट फैक्ट्रियों को नजदीक से जाना है मैंने. जिसमें से एक झारखण्ड राज्य के पलामू जिले के  जपला स्थित “बंजारी सीमेंट फैक्ट्री”. हाल ही में इस फैक्ट्री के मेन गेट पर पंजाब नेशनल बैंक के द्वारा नीलामी का एक नोटिस लगवाया गया है. जिसे लेकर स्थानीय लोगों और फैक्ट्री मजदूरों में आक्रोश है. इसी सप्ताह मैंने यह खबर स्थानीय समाचार पत्रों में पढ़ी थी. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में जेपी सीमेंट की फैक्ट्री लगी हुई है. उधर से जब भी गुजरता हूँ चारों तरफ सड़क, दुकान, घर-मकान इत्यादि पर सीमेंट ही सीमेंट नजर आता है. यहाँ तक कि सीमेंट से पुते इन्सान तक भी. इस फैक्ट्री के शुरू होने के समय उत्पन्न विवाद से तो आप रु-ब-रु होंगे ही. ज्यादा नहीं कुछ लोगों की जान गयी थी ऐसा बताते हैं. इस फैक्ट्री में रोजगार के नाम पर कुछ मजदूरों को पैरवी पर दिहाड़ी मजदूरी पर काम मिल तो जाता है. लेकिन बिचौलिए ठेकेदारों की मान-मनौअल करना पड़ता है. कुछ कमाई तो उनके ही दक्षिणा में चली जाती है. स्थानीय मजदूर बताते हैं कि अगर दो हफ्ते लगातार काम कर लो तो महीने भर आराम की जरूरत होती है. आप सोच रहे होंगे  पैसे मिल जाते होंगे गुजारे लायक. जी नहीं इतनी श्रम साध्य मेहनत करनी पड़ती है कि लाचार हो जाते हैं सब काम छोड़ घर पर आराम करने के लिए.
अब आते हैं मुख्य बात पर जहाँ से सीमेंट फैक्ट्रियों के द्वारा परिवर्तन की बात शुरू हुई थी. यानी ACC Cement की बात. २०१०-११ के अप्रैल महीने की बात है जब मैं एक Carpet Manufacturing & Export company  में काम करता था. मुझे कुछ दिनों के लिए राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित भारत की पुरानी सीमेंट फैक्ट्रियों में से एक ACC Cement की फैक्ट्री जाने का मौका मिला था. वाकया यूँ था कि कम्पनी के CSR वालों ने हमारी कम्पनी से संपर्क किया था और बताया था कि उन्होंने तक़रीबन आसपास के दस गाँवों को गोद ले रखा है. उनके आजीविका के लिए वो काम करते हैं. बहुत सारे परिवार तो फैक्ट्री में ही अलग-अलग पदों पर हैं. उनका निवेदन था कि हमारी कम्पनी Skill Development के रूप में Carpet Weaving को वहां promote करे. हमें दो दिनों के लिए उन्होंने आमंत्रित भी किया था कि हम गाँवों में लोगों से मिल लें और संभावनाएं तलाश करें. जगह का नाम था लाखेरी. बूंदी रोड पर ही पड़ता है. हमने कम्पनी के CSR हेड से मुलाकात की. उन्होंने हमें Skill Development के लिए आमंत्रित किया था और उनके हेड का अनुभव इस क्षेत्र में था ही नहीं. हमने जब एरिया विजिट के लिए बात की तो उन्होंने एक गैर सरकारी संस्था के कुछ प्रतिनिधियों को हमारे साथ लगा दिया. वही संस्था कम्पनी के लिए तीन सालों का एक प्रोजेक्ट कम्यूनिटी डेवलपमेंट पर चला रही थी.
दो दिनों के भ्रमण के बाद बहुत ही मायूस हुआ मैं. एक सौ वर्ष पूरे हो गए थे ACC Cement फैक्ट्री को यहाँ पर. गांवों को गोद लिया हुआ था उन्होंने ऐसा बताते हैं. लेकिन वर्तमान स्थति बहुत ही निराशा जनक थी. मीणा और गुर्जर ज्यादा है इस क्षेत्र में. पहाड़ी क्षेत्र है. पीने के पानी का त्राहिमाम रहता है तो कृषि की कौन पूछे. गाँवों में लोगों से मिलने के लिए हम सुबह साढ़े छः बजे गए. गाँव में एक भी महिला दिखाई नहीं पड़ी. पता चला सभी आस पास के ईट-भट्ठों पर काम करती हैं दिन भर. इसलिए सुबह छः बजे निकलती हैं और शाम पांच बजे के बाद आती हैं.बहुत ही दयनीय स्थिति है महिलाओं की वहां पर.पुरुषों में कुछ बड़े शहरों में पलायन कर गए थे और जो बचे हुए थे वो दिन भर शराब पी कर घर पर बिस्तर तोड़ते थे. गाँवों में अजीब सी मनहूसी छाई हुई थी. ऐसे वीरान गाँव तो मैंने अभी तक नहीं देखे थे.
कुल आठ सौ के आस पास मजदूर काम करते थे उस फैक्ट्री में जो कि आस-पास के गाँवों से थे. लेकिन सिर्फ दिहाड़ी मजदूर ही. और किसी बड़े पद पर कोई भी नहीं था. कम्पनी ने एक ही सुविधा दिया था कि कृषि और पीने के लिए पानी कम लागत पर उपलब्ध करा रही थी. पहाड़ों से चूना पत्थर निकल लेने के बाद क्रेटर बन जाता है. जिसमें बरसात का पानी जमा हो जाता है. फैक्ट्री वालों ने वहां पम्प लगा कर पानी नीचे तक पहुँचाने की व्यवस्था की थी. जिसे लोग पैसे से खरीदते थे अपनी आवश्यकता अनुसार. मजदूरी करने वालों में कुछ आज खाली बैठे मिल जाते हैं. कहते हैं कि मेहनत की एक सीमा होती है. कब तक कोई मजदूरी करेगा. कोई रोजी-रोजगार भी नहीं कर पाए जीवन में इसलिए खाली बैठे रहते हैं. राजस्थान अपने हैंडी क्राफ्ट की वजह से भी जाना जाता है. लेकिन आपको इस क्षेत्र में कोई कला भी नहीं मिलेगी जिससे लोग गुजरा कर सकते. बताते हैं कि पहले यहाँ कुछ क्राफ्ट का काम होता था लेकिन फैक्ट्री में मजदूरी करने के पीछे सारी कलाएं छूटती चली गयीं. आज ना तो मजदूरी करने की हिम्मत बची है न लोककला का हुनर. कम्युनिटी डेवलपमेंट के नाम पर गैर सरकारी संस्था वृक्षारोपण कराती है या फिर मंदिर बनवाती है. मंदिर क्यों? मैंने एक वोलंटियर से पूछा तो उसने जवाब दिया कि यहाँ के लोग यही चाहते हैं. कम्पनी कोई भी विरोध नहीं चाहती है इसलिए मंदिर बनवा देती है. मैंने कहा कि आप समझाते नहीं हैं कि मंदिर से क्या उनको रोजगार मिल जायेगा. उसने जवाब दिया आस्था की बात है इसलिए हम कुछ नहीं कह पाते.
मेरी इच्छा थी कि वहां पर काम शुरू किया जाए. पर ACC Cement के प्रबंधक कोई भी वित्तीय सहायता देने के लिए तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि प्रशिक्षण और उत्पादन का सारा खर्च मेरी कम्पनी वहन करे और यहाँ काम करे. अंततः कोई सहमति न बन पाने की वजह से वहां काम शुरू नहीं हो पाया. तकरीबन दस से ज्यादा मीटिंग्स की थी मैंने वहां के पुरुष और महिलाओं से. एक उम्मीद थी उनको कि कुछ आजीविका का माध्यम मिलेगा. लेकिन वह भी संभव नहीं हो पाया. आज तक़रीबन दो साल बीत चुके हैं इस बात को. टेलीविजन के विज्ञापन में सीमेंट ने गाँव को बदलता हुआ दिखा दिया लेकिन उस समय की जो स्थिति मैंने देखी थी उससे यही अनुमान लगा पा रहा हूँ कि शायद ऐसा नहीं हुआ होगा. भारत सरकार ने NRLM लांच किया है. हो सकता है कि इससे वहां रोजगार सृजन हो सके. लेकिन देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस मिशन से ज्यादा उम्मीद बेमानी ही होगी.